रोने से बढ़ती है आयु

14 09 2009

6a00e398e05cc4000500fae8e2a358000b-500piआंखों से आंसू बहाने वाला अर्थात रोने वाला व्यक्ति दीर्घायु होता है तथा उसके चेहरे एवं त्वचा में निखार भी आता है, जिससे वह लंबे समय तक युवा दिखता है, लेकिन यह तभी संभव होता है जब किसी दुख या अन्य कारणों से वास्तविक आंसू निकलते हैं। विभिन्न अवस्थाओं में निकलने वाले आंसुओं में भिन्नता रहती है। फ्लोरिडा विश्वविद्यालय के सुप्रसिद्ध अनुसंधानकर्ता एवं नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. जेम्स ने अपने लंबे अनुसंधान के दौरान पाया कि रोने से अंदर की घुटन और तड़प आंसुओं के रू प में बाहर आ जाती है और व्यक्ति खुद को हल्का महसूस करता है। यही वजह है कि महिलाएं पुरूषों की अपेक्षा अधिक सुंदर, युवा एवं दीर्घायु दिखाई देती है क्योंकि पुरूषों की अपेक्षा प्राय: वे अधिक रोती हैं।





आठ अजूबे इस दुनिया में

8 09 2009

हमने वही जानी पहचानी लोकतांत्रिक पद्धति का सहारा लिया। हमने समाज के कुछ लोग चुने और उनसे जाकर पूछा-आपकी नजर में ये आठ अजूबे हैं क्या। उनके जवाब कुछ ऎसे रहे…
1. टेलीविजन
अपने महादेश का पहला अजूबा है “टेलीविजन”। सारा देश इससे चिपका रहता है। बच्चे टीवी के चक्कर में खाना भूल जाते हैं और बड़े सोना। ऎसे-ऎसे दृश्य दिखाए जाते हैं कि बेटा बाप से ज्यादा ज्ञानी हो जाता है। एक कहावत है “करेला और नीम चढ़ा।” अजूबे में अजूबा है अपने न्यूज चैनल। क्या हाहाकारी प्रोग्राम आ रहे हैं- नाचती नागिन और नाग, भूत बंगले का रहस्य, पीपल के पेड़ का भूत, पिछले जनम की दास्तान। सामाजिक सीरियल देख बच्चे अपनी मम्मी से सवाल करते हैं-मम्मी-मम्मी आप भी प्रेरणा आंटी की तरह नई-नई शादी क्यों नहीं करतीं।

2. मोबाइल
हमारे ज्ञानी जजों ने दूसरा अजूबा करार दिया है “मोबाइल” को। जिसे देखो हाथ मे दबाए घूम रहा है। एक घर में पांच मैंबर और मोबाइल। खा रहे हैं तो बज रहा है। सो रहे हैं तो बज रहा है। ससुरा प्रेम करते वक्त भी चुप नहीं रहता। पल भर में सारा नशा काफूर। मोबाइल ने झूठ बोलना सीखा दिया। पति महाशय अपनी पुरानी माशूका से मिलने उसके घर जा रहे हैं और पत्नी को कह रहे हैं मंदिर जा रहा हूं, थोड़ी देर हो जाएगी। युवक व युवतियां एक-दूसरे को एसएमएस किए जा रहे हैं। महान गायक कौन करो एसएमएस। सबसे लोकप्रिय अभिनेत्री कौन करो एसएमएस। धोनी को लंबे बाल रखने चाहिए या काटने चाहिए करो एसएमएस।

3. हिंदी फिल्में
समकालीन जीवन का तीसरा अजूबा है हमारी “हिंंदी फिल्में”। जिंदगी से दूर। यथार्थ से परे। सपनों की दुनिया। पता ही नहीं चलता कौन किससे प्रेम कर रहा है। मेले में बिछड़े दो भाई अब ऑस्ट्रेलिया में जाकर दोस्त बन गए। नायिकाएं वैंप बन रही हैं। एक सीरियल किसर पैदा हो गया। फलां फिल्म में फलां हिरोइन ने कितने चुंबन दिए। फलां ससुर ने फलां बहू के किसिंग दृश्य फिल्म से हटवाए। गायक नायक बन रहे हैं नायक गायक। नायिकाएं एक गाने में आकर मटक जाती हैं और डेढ़ करोड़ झटक कर ले जाती हैं। पुरानी बोतलों में नई शराब भरी जा रही है।

4. क्रिकेट
चौथा अजूबा है “क्रिकेट”। बड़े बूढ़े कहते थे अंगे्रज मर गए औलाद छोड़ गए। हम कहते हैं फिरंगी चले गए क्रिकेट पटक गए। सारा देश क्रिकेट का दीवाना है। बिल्ली के भाग्य से सन् तिरासी में छींका क्या फूटा कि हम अपने को फन्ने खां समझने लग गए। जिसे देखो वहीं गेंद-बल्ला चला रहा है। कभी-कभी पदाधिकारी जूते भी चला देते हैं। अरबों की आमदनी सचिन की कमर में दर्द हो जाता है, तो सारा देश बैड रेस्ट करने लगता है। गांगुली के लिए आंदोलन होता है। धोनी पर लड़कियां टूट पड़ती हैं। खूब माल बंटता है। जिन्हें माल नहीं मिलता, वे जूतियों में दाल बांटने लगते हैं।

5. एनजीओ
हमारे दश का पांचवा अजूबा है “एनजीओ”। “कर सेवा और खा मेवा” यह वाक्य ऋषियों ने बनाया था। आज के एनजीओ का सूत्र वाक्य है “सेवा दिखा-मेवा कमा।” सेवा करने में क्या रखा है, बस सेवा करते दिखाना जरूरी है। सरकारी अनुदान खाओ मजे उड़ाओ। बाबू के पांच सैंकड़ा, छोटे अफसर के सात सैंकड़ा, अफसर के पंद्रह सैंकड़ा। दस सैंकड़ा में कौवे, कुत्ते और गौ माता। अगर सौ में से सैंतीस फिसदी दान करने का कलेजा है, तो बेटा तेरे एनजीओ को ऊपर वाला भी अनुदान देने से इनकार नहीं कर सकता। हालांकि वह तो भाव का भूखा है। प्रसादी में ही राजी हो जाता है।

6. राजनीति
छठा अजूबा है “पॉलिटिक्स”। आज हमारे देश में चपरासी बनने के लिए भी मिडिल पास होना चाहिए। पर मंत्री बनने के लिए न पढ़ाई की जरूरत है न लिखाई की। जिसके हाथ में लाठी वही राजनीति की भैंस हांकने लग जाता है। मंत्री का बेटा मंत्री बनना तय है। जनता का बेटा जूतियां चटखाता घूमता है। नेता का पुत्र पैदा होते ही सरकारी कार पा जाता है। कहने वाले कहते हैं कि मेरे देश का नेता सौ में से नब्बे बेईमान, फिर भी मेरा देश अपने को कहता है महान।

7. हंसी
आज के युग का सातवां अजूबा है “हंसी”। यह खबर पढ़कर गश आ गया कि सौ चुटकुलों ने एक हजार करोड़ का कारोबार कर डाला। यह सुनते ही हमारा मन हुआ कि सारे पुस्तकालय फूंक डालें। किताबें जला दें। डिग्रियां फाड़ दें। बस चुटकुले याद करें। हंसे और हंसाए। हंसी का यह आलम हो गया कि महाशय जुगाली चंद्रजी ने अपनी वसीयत में लिखा कि मेरे बारहवें पर सिद्धू, शेखर और पेरिजाद कोला के संग बारह हंसोड़ों के बुलाना और उन्हें श्राद्ध खिलाना।

8. अपनी जोड़ी
तो जनाब ये तो हुए सात अजूबे। पर आठवां अजूबा है “अपनी जोड़ी”। अपनी जोड़ी मे कोई भी दो हो सकते हैं जैसे मियां-बीवी, सास-बहू, बाप-बेटा, दोस्त-दोस्त, प्रेमी-प्रमिका, लड़का-लड़की, नेता-कुर्सी, काला धंधा-पूंजी अर्थात जो भी दो चीजें मिल कर मुनाफा कमा लें, वहीं आठवां अजूबा है। ज्ञानीजनों हमें माफ करना। ये अजूबे हमारे दिमाग की उपज नहीं हैं। हमने तो जैसा सुना वैसा लिखा। अगर आपको “आरती” उतारनी हो, तो उन लोगों की उतारना जिनके बारे में हमने अजूबा-कथा के प्रारंभ में बताया था।





योग : आंखों के लिए आसन

29 08 2009

दिनभर के काम से आंखों का थक जाना आम बात है, इससे हमें परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। इससे निजात पाने के लिए आइए कुछ अभ्यास सीख लें।

पॉमिंग : किसी भी आरामदायक स्थिति में बैठ जाएं और कुछ पल के लिए आंखें बंद कर लें। दोनों हथेलियों को आपस में तेजी से रगड़ें, ताकि वे गरम हो जाएं। उसके बाद दोनों हथेलियों को आंखों की पलकों पर रखें और हाथ की ऊर्जा को बंद आंखों से धारण करें। कुछ ही पल में आप आराम महसूस करेंगे। जब तक हथेलियों की गर्मी को महसूस करें, तब तक इसी अवस्था में रूकें। उसके बाद हथेलियों को हटा लीजिए। आंखें बंद ही रखें और इस क्रिया को तीन बार दोहराएं।

विशेष : अंगुलियों से आंखों पर दबाव न डालें। सिर्फ हथेलियों के बीच के भाग से ही आंखों को ढकें।

लाभ : जब भी आप पढ़ाई करते समय, टेलीविजन देखने, कंप्यूटर पर काम करने या किसी भी कारण से आंखों में तनाव महसूस करें, तब इस क्रिया का अभ्यास जरूर करें।





लंबाई नहीं बढ़े तो!

29 08 2009

heightक्या आपक ा बच्चा अपने हम उम्र बच्चों से लंबाई में छोटा है यदि हां, तो अभी से चेत जाइए। हो सकता आपके बच्चे की लंबाई “सीलिएक डिजीज” की वजह से नहीं बढ़ रही हो। ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज [एम्स] नई दिल्ली में हुए एक अनुसंधान के निष्कर्षों से पता चला है कि बच्चों की लंबाई नहीं बढ़ने का एक प्रमुख कारण सीलिएक डिजीज है।

क्या है सीलिएक
सीलिएक यानी गेहूं से एलर्जी की बीमारी। दरअसल सीलिएक रोग में गेहूं से एलर्जी के कारण उसमें पाए जाने वाले “ग्लूटेन” प्रोटीन का शरीर में पाचन नहीं हो पाता और मरीज की छोटी आंत की विलाई नष्ट होने लगती है। गेहूं अपने आप में बुरा नहीं है, लेकिन गेहूं में पाए जाने वाले कुछ तžवों [प्रोटीन] से कई लोगों को एलर्जी हो जाती है, तो उनको सीलिएक रोग हो जाता है। यह ठीक वैसा ही है, जैसे किसी व्यक्ति को किसी दूसरे तžवों [चीजों] से एलर्जी हो जाती है और वह अस्थमा ग्रस्त हो जाता है। प्रभावित व्यक्ति में दस्त, पेट फूलना, सर्दी जुकाम, रक्त की कमी, अस्थमा, शारीरिक वृद्धि रूक जाना जैसी शिकायतें रहने लगती हैं।

कौन प्रभावित होता है
वैसे तो सीलिएक डिजीज किसी भी उम्र के मरीजों में पाई जा सकती है, पर सबसे ज्यादा यह बीमारी बच्चों में डायग्नोस की जाती है।

एम्स में शोध
ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, नई दिल्ली
में एंडोक्राइनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म डिपार्टमेंट के वैज्ञानिकों ने एक रिसर्च में पाया कि लंबाई नहीं बढ़ने की शिकायत लेकर आए 100 बच्चों में 18 बच्चों को सीलिएक डिजीज है। पेट के लक्षणों के अलावा इस बीमारी का एक प्रमुख लक्षण है बच्चों की लंबाई नहीं बढ़ना। ऎसा भी संभव है सीलिएक डिजीज से ग्रस्त बच्चों में लंबाई नहीं बढ़ने के अलावा दूसरे कोई लक्षण ही नहीं हों।

अत: ऎसे बच्चे जिनकी लंबाई नहीं बढ़ रही हो एक साधारण ब्लड टेस्ट [टीटीजी] कराकर सीलिएक डिजीज की पहचान की जा सकती है। समय पर सही डायग्नोसिस और उपचार से बच्चों को राहत मिल सकती है।

क्या है उपचार
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में असिस्टेंट प्रोफेसर एवं एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. राजेश खड़गावत कहते हैं, “एक बार सीलिएक डिजीज डायग्नोसिस हो जाए, तो गेहूं से बनी हुई चीजें जीवन भर के लिए बंद करनी पड़ती हैं।”

क्या खाएं
चावल, चिवड़ा, मुरमुरा, अरारोट, साबूदाना, मक्का, ज्वार, बाजरा, सिंघाड़े का आटा, कुट्टू का आटा, आलू का आटा, दूध और दूध से घर में बने पदार्थ, मक्खन, घी, मछली, चिकन, अंडा, सभी दालें, सभी फल, सब्जियां, चाय, कॉफी, शहद, रसगुल्ला, घर के बेसन की बनी चीजें, इडली, डोसा, सांभर बड़ा, पॉपकॉर्न, चना [भूंगड़े], चावल के नूडल्स, पेठा इत्यादि।
क्या नहीं खाएं

गेहूं, गेहूं का आटा, मैदा, पूरी, सूजी, सेवइयां, जौ, जई, समोसा, मठरी, पैटीज, ब्ा्रेड, दलिया, बाजार की आइसक्रीम, चॉकलेट, दूध, शैक, बर्फी, जलेबी, सॉस, टॉफी, कस्टर्ड पाउडर, बॉर्नविटा, बूस्ट, गुलाब जामुन, बिस्कुट, प्रोटीन पाउडर, रेडिमेड कॉर्नेफ्लेक्स।





लिखिए स्वस्थ रहिए

24 08 2009

लिखते समय आप खुद का ही सामना करते हैं। यह खुद को समझने का स्वर्णिम अवसर होता है।
गम भूलाने के लिए कविता को सबसे अघिक प्रभावी थैरेपी माना गया है। अमरीका की मनोचिकित्सक जैक लिडी वह पहली महिला थी, जिसने रोगियों की चिकित्सा के लिए 1950 में कविता या कविता के अंश का उपयोग किया। अपनी पुस्तक “पोएटिक थैरेपी” में उन्होंने इसकी विस्तृत चर्चा की है। उन्होंने एसोसिएशन ऑफ पोएटिक थैरेपी का गठन भी किया था। एक गीतकार ने लिखा भी है, “है सबसे मघुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं।”

“अपना गम लेकर कहीं और न जाया जाए, कागज-कलम लेकर कुछ लिखा ही जाए।” जी हां, जब भी आपका मन उदास हो, भीतर तूफान उठा हो, क्लेश से जीवन अशांत हो, कलम उठाओ और लिखना शुरू कर दो। कुछ भी लिखें, कविता, कहानी, आत्मकथा, डायरी… सचमुच आप राहत महसूस करेंगे। यकीन न हो, तो स्वयं करके देख लीजिए। विशेषज्ञ भी यही कह रहे हैं राइटिंग एक थैरेपी है सम्पूर्ण पद्धति, जो आपकी मन:स्थिति को बदल देती है। दरअसल तन-मन को तरोताजा कर देने वाली राइटिंग थैरेपी वर्तमान में सर्वाघिक हॉटेस्ट चिकित्सा पद्धति है, क्योंकि यह नई है और कारगर भी।

अंतर्मुखी स्वभाव के लोग अक्सर अपनी परेशानियों को लेकर अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं, वे अपनी पीड़ा किसी को नहीं बताते। यदि उन्हें लिखने के लिए कह दिया जाए, तो गमों से उनका घ्यान बंटेगा। वे अपनी पीड़ा को व्यक्त कर पाएंगे। उनके दर्द कम होंगे और इस तरह लेखनी उनकी हमदर्द बन जाएगी। महान साहित्यकार प्रेमचंद ने तो कहा ही यही है कि लिखते तो वे लोग हैं, जिनके अंदर कुछ दर्द है, अनुराग है, लगन है, विचार है।

लेखन की शक्ति को मनोचिकित्सक भी मानते हैं। दिल्ली के मनोचिकित्सक डॉ. अवघेश शर्मा अपने रोगियों को लिखने की सलाह देते हैं। “डिस्ट्रेस टू डिस्ट्रेस” पुस्तक में वे लिखते हैं कि लेखन हमारे विचारों की दशा और तनावजनक स्थितियों से उपजी समस्याओं को समझने में सहायता करता है। समस्या के समझ में आते ही समाघान भी तुरंत मिल जाते हैं। अपोलो अस्पताल के सलाहकार चिकित्सक डॉ. अचल भगत भी अपने रोगियों से लिखने का आग्रह करते हैं। उनके अनुसार चिकित्सा की इस कॉग्रिटिव प्रणाली में रोगियों की मानसिकता को बदलने एवं उनकी समस्या के समाघान की क्षमता होती है।

दस साल की बिन मां-बाप की बच्ची संजू अपनी छोटी-छोटी बातें डायरी में लिखकर अकेलापन दूर करने की कोशिश करती है। सविता ने अपने तेरह साल के बच्चे के निघन के बाद लिखना शुरू किया, इस लेखन ने उसके इतने बड़े गम को भूलाने में मदद की। उसे शब्दों की शक्ति का अनुमान हुआ। मुम्बई निवासी निम्मी कुमार का लिखना तो उदाहरण ही बन गया है। बच्ची की बीमारी से दुखी निम्मी ने 1986 में शिरड़ी सांईबाबा का नाम सवा लाख बार लिखने का संकल्प लिया। 50 हजार से ऊपर नाम लिखने के बाद उसने नाम को सीघा-सीघा न लिखकर कुछ इस तरह कलात्मक ढंग से लिखा कि गणेश की आकृति बन गई। इसी से प्रेरित होकर उसने यही नाम बड़े कैनवास पर लिखना शुरू कर दिया। गणेश के बाद उसने शिव, दुर्गा आदि के चित्र बनाए। आलम यह है कि आज उसकी पेंटिंग्स की संख्या 300 से ऊपर हंै। उसकी एकल प्रदर्शनी दिल्ली, मुंबई सहित विदेशों में भी आयोजित हो चुकी है।
इस मुकाम पर पहुंचने के बाद निम्मी कहती हैं कि इस लेखन ने मेरे लिए थैरेपी का ही काम किया है। इसने मुझे कठिन परिस्थितियों मे जीने का संबल दिया, कार्यो में एकाग्रता प्रदान की और असीम शक्ति दी।

पंजाबी की विख्यात लेखिका अमृता प्रीतम भी लेखन को थैरेपी मानती थीं। उनका कहना था कि लिखते समय आप खुद का ही सामना करते हैं। यह खुद को समझने का स्वर्णिम अवसर होता है। पर इससे भी महžवपूर्ण है कि “क्या आप कभी साक्ष्य बने हैं-योग अथवा आघ्यात्मिकता के उच्चतम आदर्श का-आप अनुभव या लेखन करते हैं और साक्ष्य भी बनते हैं। अन्य लेखक भी लेखन को थैरेपी मानते हैं या नहीं यह उनके जागरूकता के उच्चतम स्तर पर पहुंचने की उत्कंठा पर निर्भर करता है। यदि वे मात्र ख्याति प्राप्त करने के लिए लिख रहे हैं तो वह व्यर्थ है।”

पुलिस पदाअघिकारी किरण बेदी का भी यही मानना है कि लेखन थैरेपी है। आपने जो लिखा है, आप उसे देख सकते हैं, पढ़ सकते हैं और उसकी समीक्षा भी कर सकते हैं। वास्तव में आप दो व्यक्तियों मे बंट जाते हैं, लेखक और पाठक। किरण बेदी ने तिहाड़ जेल के कैदियों को भी अपनी भावनाओं को लिखने की सलाह दी थी, जिसका संकलन बाद में हिंदी, अंगे्रजी और उर्दू में प्रकाशित करवाया गया। लेखन घ्यान की तरह है। यह मस्तिष्क को स्थिरता प्रदान करता है, तनाव कम करता है, जीवन खुशियों से भर देता है। यही नहीं सोच और मनोवृत्ति को भी बदल देता है ।आप अंतर्मुखी से बहिर्मुखी होने लगते हैं, नकारात्मक सोच की बजाय सकारात्मक सोच विकसित करता है। लिख कर आप स्वस्थ और तरोताजा महसूस करते हैं।

इस तरह लेखन चिकित्सा का एक रूप हो सकता है। अगर आपका मन यह स्वीकार नहीं करता, तो भी क्या बुराई है लेखन में। इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं है, न ही आपको कोई शुल्क चुकाना है। तो फिर न झिझकें, उठाएं कागज-कलम और लिखें अपने विचारों और भावनाओं को। क्या लिखना है, नहीं लिखना है, कैसे लिखना है, लिखना है या नहीं यह अब आपके हाथ में है।





Crime Prevention begins at home : बच्चों को चाहिए इमोशनल टच

10 08 2009

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सोलह वर्षीय ब्रेन्डा स्पेन्सर को उसके जन्मदिन पर गिफ्ट के रूप में रायफल मिली। उसने अपने सैन डिएगो स्थित घर के नजदीक एक प्रायमरी स्कूल में बच्चों पर गोलियां चला दीं। दो बच्चों की जान चली गई। नौ घायल हो गए। इस बाबत उससे पूछा गया तो उसका जवाब था मुझे सोमवार पसंद नहीं है। मैंने जो कुछ किया, उससे वह सोमवार जीवन्त हो उठा।

टैक्सास के एलिस काउंटी में गांव की एक सड़क पर दो लाशें पड़ी मिलीं। उनमें से एक चौदह वर्षीय लड़के की थी, जिसे गोली मार दी गई थी। लेकिन, दूसरी लाश एक तेरह वर्षीय लड़की की थी, जिसके साथ बलात्कार करके उसे मार कर लाश को क्षत-विक्षत किया गया था। उस लड़की की लाश से उसका सिर और हाथ गायब थे। हत्यारा बाद में पकड़ा गया, जिसका नाम जेसन मेसी था। मेसी ने तय किया था कि वह ऎसा कुख्यात सीरियल किलर बने जैसा टैक्सास के इतिहास में दूसरा कोई नहीं हुआ। वह जब नौ वर्ष का था तो उसने सबसे पहले एक बिल्ली की हत्या की। बाद में कई कुत्तों और गायों की हत्या की। उसकी डायरी में युवतियों के साथ बलात्कार, हत्याओं और नरभक्षी की कई काल्पनिक कहानियां लिखी मिलीं। वह मानता था कि वह उस मालिक की सेवा कर रहा है, जिसने उसे ज्ञान और शक्तिदी है। उस पर लड़कियों की हत्याएं करने और लाशों को कब्जे में रखने का पागलपन सवार था।

फ्लोरिडा के नौ वर्षीय जेफ्रे बैले ने एक तीन वर्षीय बच्चे को मोटल के तरणताल में गहरे पानी में ले जाकर डुबोया और तरणताल के किनारे कुर्सी लगाकर बैठ गया। वह उसे तब तक देखता रहा, जब तक उसकी जान नहीं चली गई। वह किसी को डूब कर मरते हुए देखना चाहता था। जब उससे पूछा गया तो वह शान से पूरा वृतांत बताता रहा उसने जो कुछ किया उसका उसे लेश-मात्र भी दुख नहीं था।

ये कुछ बच्चों के उदाहरण हैं, जो विकृत मस्तिष्क के थे। ऎसी घटनाओं से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि पागलपन केवल वयस्कों में ही नहीं होता। बाल विशेष्ाज्ञों का विश्वास है कि बच्चों में पागलपन निरंतर बढ़ता जा रहा है। एक शोध में इन बच्चों को पागल बच्चे (साइकोपैथ) करार दिया गया है। कहा गया है कि ये बच्चे वयस्क पागलों से भी अधिक खतरनाक हैं। हो सकता है कि ये हत्या जैसा जघन्य अपराध न कर पाएं या उनमें ऎसा अपराध करने का दुस्साहस न हो। लेकिन, वे अपने लाभ के लिए दूसरों का अहित करने, उन्हें धोखा देने और उनका शोषण करना सीख जाते हंै। समझा जाता है कि ऎसे बच्चों में सहानुभूति का वह भाव पनप नहीं पाता, जिसके कारण लोग दूसरे के दुख को महसूस कर पाते है। उनमें इसकी बजाए क्रोध, बेईमानी, घमंड, बेशर्मी और निर्दयता की भावनाएं पैदा होने लगती हैं।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने अमरीका में हत्या के आरोपियों के पिछले पचास वर्षो के इतिहास में से करीब सौ मामले लिए और उनमें से किशोर वय के 19 हत्या के आरोपियों को अध्ययन के लिए छांटा। इससे पता लगा कि जहां वयस्क अपराधी अपराध की वारदात अकेले ही करना पसंद करते हैं, वहीं बच्चे अपने साथियों के सहयोग से जघन्य अपराध को अंजाम देते हैं। पिछले बीस वर्षो में हुई स्कूली हिंसा के बीस मामलों में नेशनल डेंजर एसेसमेंट एसोसिएशन की सीक्रेट सर्विस ने यह पाया कि अपराध करने से पहले बच्चे किसी न किसी को यह बताते रहे हैं कि वे क्या करने जा रहे हैं, ऎसे बच्चों में से आधे का मानसिक संतुलन बिगड़ा हुआ था।

कनाडा के विशेषज्ञ डॉ. डेविड लाइकेन के अनुसार असामाजिक व्यवहार करने वाले अधिकांश बच्चों का विकास मां-बाप के साए में अच्छी तरह नहीं होता। या तो उनके पिता नहीं होते या पिता उनकी सही देखभाल नहीं करते और उनकी माएं भी उन्हें समाज में रहने के तौर-तरीके सिखाने पर ध्यान नहीं देती। लाइकेन ऎसे बच्चों को सोशियोपैथ कहते हैं और उनका मानना है कि उनके सामाजिक जीवन में सुधार कर उनकी संख्या घटाई जा सकती है। उनका कहना है कि अपराध प्रवृत्ति का कारण आनुवांशिक भी होता है। लेकिन, इस तरह मिली आनुवांशिक प्रवृत्तियों को मां-बाप अच्छे लालन-पालन से बदल सकते हैं। उन बच्चों में आनुवांशिकता में मिली अपराध की भावना को निडरता, पहल करने की प्रवृत्ति तथा संवेदनशीलता के गुणों में भी बदला जा सकता है।

यह मां-बाप पर निर्भर करता है और जहां मां-बाप अपने इस दायित्व को निभाने में असफल रहते हंै, वहीं बच्चे हिंसक हो उठते हैं। वे कहते हंै कि अच्छे लालन-पालन से उन्हें बदला जा सकता है। कुछ अध्ययनों में बताया गया है कि पागल बच्चों के मस्तिष्क में असामान्य हलचलें होती हैं। कुछ परिस्थितियों में उनमें अन्य बच्चों की तुलना में देर से प्रतिक्रिया होती है। जैसे सजा मिलने का भय उनमें सामान्य बच्चों की अपेक्षाकृत कम होता है। उन्हें वे काम करने में ज्यादा मजा आता है, जिनसे उनके नर्वस सिस्टम में उत्तेजना पैदा होती है। बाल विकास के क्षेत्र में कई अनुसंधानकत्ताüओं का विश्वास है कि बच्चे का यदि अपने मां-बाप से भावनात्मक जुड़ाव गहरा हो तो उसके हिंसक होने की आशंकाएं घट जाती हैं। व्हाय वर सन्स टर्न वाइलेंट एंड हाऊ वी केन सेव देम पुस्तक के लेखक डॉ. जेम्स गर्बारिनो का कहना है कि बाल विकास मूलत: सामाजिकता से जुड़ा है।

बच्चों और बाहरी दुनिया के बीच संबंधों में उससे स्नेह करने वाले माता-पिता महत्वपूर्ण कड़ी हंै। बच्चे संबंधों के जरिए ही बाहरी दुनिया से जुड़ पाते हैं। जो बच्चे हत्या जैसे जघन्य अपराध में लिप्त हो जाते हैं, वे दरअसल बाहरी दुनिया से सही ढंग से जुड़ नहीं पाते। बच्चे में अगर क्रोध, प्रतिरोध, अविश्वास, घृणा, संशय के दोष उत्पन्न होते हैं तो इसका कारण यह है कि जन्म के नौ माह में उसका लालन-पालन ढंग से नहीं हुआ। अध्ययन के अनुसार जिन बच्चों का जन्म के बाद पहले नौ माह में लालन-पालन अच्छे ढंग से होता है, वे बाद के जीवन में अधिक प्रतिस्पर्द्घी तथा सामंजस्य का जीवन जीते हैं। अपने जीवन के पहले नौ माह में से भी पहले तीन माह नवजात शिशु अपना संबंध अपने माता-पिता से जोड़ने का प्रयास करता है। कुछ नवजात शिशु सरल होते हैं, जबकि कुछ जटिल प्रकृत्ति के।

माता-पिता को इस संबंध को प्रगाढ़ बनाने के लिए अपनी तरफ से प्रयत्न करने पड़ते हैं। इन आरंभिक माह में बच्चे से संबंध जोड़ना वैसे भी बहुत मुश्किल होता है। एक-दो माह के बच्चे को अगर उसके लालन-पालन के दौरान कई हाथों से गुजरना पड़े तो वह किसी से भी गहरा संबंध नहीं जोड़ पाता। ऎसे बच्चे को जब कोई उठाएगा तो वह उससे आंखें नहीं मिलाता बल्कि उनकी हरकत का प्रतिरोध करेगा। ऎसे बच्चों की माताओं को प्रयत्न करना चाहिए कि जब वे अपने बच्चों को स्तन-पान कराएं तो कोशिश करें कि बच्चा उनसे आंख मिलाते हुए दूध पीए। बच्चे का अपनी मां से जुड़ाव गहरा होता है।

दूध, मांस, फल तथा सब्जियां जिस तरह शरीर के लिए जरूरी है, उसी तरह बच्चे को संतुलित अवस्था में भावनात्मक पोषण की भी आवश्यकता है। माता-पिता का यह दायित्व है कि वे बच्चे को समाज से जोडे और उनमें वे गुण पैदा करें कि वे समाज में बुराइयों की पहचान कर सकें और उनसे दूर रह सकें। अनुसंधानों से यह भी पता लगा है कि बच्चे में गर्भावस्था के दौरान ही हिंसक भाव विकसित होने लगते हैं। नवजात शिशु को संतुलित आहार के साथ संतुलित भावनात्मक पोषण भी मिलना चाहिए। उसके अच्छे चरित्र का निर्माण हो सकेगा।





पाएं खुशियां ही खुशियां

8 08 2009

चिंता अच्छे से अच्छे आदमी को बीमार बना सकती है। चिंता को जीतने का सर्वश्रेष्ठ तरीका समस्या का विश्लेषण कर उसके अनुसार हल निकालना है। चिंता के बारे में सोचें, मगर उसे स्वयं पर हावी न होने दें। प्रसिद्ध दार्शनिक और चिंतक डेल कारनेगी ने अपनी पुस्तक “चिंता छोड़ो, सुख से जियो” में चिंता दूर करने के कई कामयाब नुस्खे बताए हैं। इनमें से आपके लिए पेश हैं चुनिंदा फार्मूले।
पहला फार्मूला
इससे पहले की चिंता आपको खत्म करे आप चिंता को खत्म कर दें।
वह रात मुझे याद रहेगी जब मैरियन जे. डगलस ने हमें क्लास में अपनी आप बीती सुनाई। उसने हमें बताया कि कैसे उसके घर में दो हादसे हुए। पहली बार उसकी प्यारी सी पांच साल की बच्ची मर गई और दस माह बाद पैदा हुई एक और लड़की पांच दिन में ही चल बसी।
यह दोहरा हादसा असहनीय था। मैरियन ने कहा, “मैं इसे नहीं झेल पाया। मैं न तो सो पाता, न खा पाता, न ही आराम कर पाता। मेरी हिम्मत टूट चुकी थी और मेरा आत्मविश्वास जवाब दे चुका था। ऎसा लगता था जैसे मेरा शरीर किसी शिकंजे में जकड़ा हो और शिकंजा लगातार कसता जा रहा हो। परन्तु ईश्वर की कृपा से मेरा एक बच्चा जीवित था। मेरा चार साल का पुत्र। उसने मेरी समस्या सुलझा दी। एक दोपहर जब मैं दुख में डूबा बैठा था तो, उसने आकर कहा, “डैडी मेरे लिए बोट बना दो।” उस समय कुछ भी करने का मूड नहीं था। परन्तु मेरा बेटा जिद्दी था। आखिरकार मुझे हार माननी पड़ी। उसकी टॉय बोट बनाने में मुझे तीन घंटे लगे। जब मैंने बोट पूरी बना ली तब जाकर मुझे अहसास हुआ कि दरअसल महीनों की चिंता के बाद इन तीन घंटों में मुझे इतनी शांति और मानसिक राहत मिली थी। इस खोज ने मुझे नींद से जगाया। सोचने पर मजबूर कर दिया। कई महीनों में पहली बार मैं कुछ सोच रहा था। मैंने महसूस किया कि जब हम किसी काम की योजना बनाने और सोचने में व्यस्त हो जाते हैं, तो चिंता करना मुश्किल होता है। मेरे मामले में बोट बनाने के काम ने मेरी चिंता को चारों खाने चित्त कर दिया। इसलिए मैंने फैसला किया कि मैं खुद को व्यस्त रखूंगा।”
“अगली रात को मैं पूरे घर में घूमा और उन कामों की सूची बनाई, जो किए जाने चाहिए थे। दो सप्ताह में मैंने 242 कामों की सूची बना ली। अगले दो साल में मैंने इनमें से ज्यादातर काम पूरे कर दिए। इसके अलावा मैंने अपने जीवन को प्रेरक और दूसरी गतिविधियों में व्यस्त कर दिया। मैं अब इतना व्यस्त हूं कि मुझे चिंता करने के लिए वक्त ही नहीं मिलता।”
व्यस्त रहने जैसे सामान्य कार्य से हमारी चिंता क्यों दूर हो जाती हैक् ऎसा एक नियम के कारण होता है। यह नियम मनोविज्ञान के सबसे मूलभूत नियमों में से एक है। यह नियम है-”कोई भी मानवीय मस्तिष्क, चाहे वह कितना ही प्रतिभाशाली क्यों न हो, एक समय में एक से ज्यादा चीजों के बारे में नहीं सोच सकता।
जॉर्ज बर्नाड शॉ सही थे। उन्होंने अपने एक वाक्य में सब कुछ कह दिया। उनका कहना था,”दुखी होने का रहस्य यह है कि आपके पास यह चिंता करने की फुरसत हो कि आप सुखी हैं या नहीं।” तो इस बारे में सोचने की झंझट ही नहीं पालें। अपने हाथ मलें। कमर कसें और व्यस्त हो जाएं।
दूसरा फार्मूला
याद रखें, आपके जैसा इस दुनिया में कोई नहीं है।
एक बड़ी तेल कंपनी के रोजगार निदेशक पॉल बॉइन्टन से मैंने पूछा कि लोग रोजगार के लिए आवेदन देते समय सबसे बड़ी गलती कौन सी करते हैं। बॉइन्टन हजारों लोगों के इंटरव्यू ले चुके थे और उन्होंने इस विषय पर एक पुस्तक भी लिखी थी। उनका कहना था, “नौकरी के लिए आवेदन देने में लोग सबसे बड़ी गलती यह करते हैं कि वे अपने वास्तविक स्वरूप में नहीं रहते। अपने असली व्यक्तित्व में रहने और पूरी तरह खुलकर बताने के बजाए वे अक्सर ऎसे जवाब देने की कोशिश करते हैं, जो उनके हिसाब से आप सुनना चाहते हैं। परन्तु यह तरीका सफल नहीं होता, क्योंकि कोई भी नकली चीज नहीं चाहता। कोई भी जाली सिक्का नहीं चाहता।”
आप में और मुझमें इस तरह की योग्यताएं हैं, इसलिए इस बात की चिंता करने में एक पल भी बर्बाद न करें कि हम दूसरे लोगों की तरह नहीं हैं। आप इस दुनिया में एकदम अनूठे हैं। जेनेटिक्स विज्ञान हमें बताता है कि आप जो हैं, वह पूरी तरह से आपके पिता के चौबीस और आपकी माता के चौबीस क्रोमोसोम की देन है। हर क्रोमोसोम में दर्जनों से लेकर सैंकड़ों जीन्स हो सकते हैं और कई बार तो एक जीन ही इंसान के पूरे जीवन को बदलने की क्षमता रखता है।
आपके माता-पिता के मिलने और समागम के बाद आपकी तरह का निश्चित इंसान पैदा होने की संभावना तीन लाख बिलियन में से एक थी। दूसरे शब्दों में, अगर आपके तीन लाख बिलियन भाई-बहन होते तो, वे सबके सब आपसे अलग हो सकते थे। क्या यह बात अनुमान पर आधारित है। जी नहीं। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है। जब चार्ली चैप्लिन फिल्मों में आए, तो फिल्म निर्देशकों ने इस बात पर जोर दिया कि चैप्लिन उस युग के एक लोकप्रिय जर्मन कॉमेडियन की नकल करें। परन्तु चार्ली चैप्लिन को तब तक कामयाबी नहीं मिली जब तक उन्होंने अपने असली स्वरूप में अभिनय नहीं किया।
इमर्सन ने “सेल्फ-रिलायेंस” निबंध में लिखा है, “हरेक इंसान में जो शक्ति निवास करती है, वह प्रकृति में नयी है। दूसरा कोई नहीं, सिर्फ वही जानता है कि वह क्या कर सकता है। वह तब तक नहीं जान सकता, जब तक वह कोशिश न कर ले।” इसलिए यह जान लें कि आप अनूठे हैं। इस बात पर खुश हों और प्रकृति ने आपको जो दिया है, उसका अधिकतम लाभ उठाएं।
तीसरा फार्मूला
अगर आपको नीबू मिले, तो आप नीबू का शर्बत बना लें।
मैं एक दिन शिकागो यूनिवर्सिटी गया और वहां के कुलपति रॉबर्ट मैनार्ड हचिन्स से पूछा, “वे किस तरह चिंताओं को दूर रखते हैं।” उन्होंने जवाब दिया, “जब आपको नीबू मिले तो आप नीबू का शर्बत बना लें।”
“अच्छी चीजों का लाभ उठाना जिंदगी में सबसे महžवपूर्ण बात नहीं है। कोई मूर्ख व्यक्ति भी ऎसा कर सकता है। असली महžव की बात तो यह है कि आप अपने विपरीत हालातों से लाभ उठा सकें। इस काम में बुद्धि की जरूरत होती है और इसी से मूर्ख और समझदार के बीच का फर्क समझ आता है।”
न्यूयार्क में कक्षाएं चलाने के दौरान मैंने यह पाया कि बहुत से लोग मात्र इस बात का अफसोस मनाते हैं कि कॉलेज शिक्षा के बगैर जीवन में सफलता की संभावना कम होती है। मैं जानता हूं कि यह पूरी तरह सच नहीं है। इसलिए मैं अपने विद्यार्थियों को ऎसे इंसान की कहानी सुनाता हूं, जिसने कभी प्रारंभिक शिक्षा भी पूरी नहीं की। वह बेहद गरीबी में पला-बढ़ा। जब उसके पिता मरे, उसके पिता के दोस्तों को चंदा इकटा करके उनके कफन का इंतजाम करना पड़ा। उसके पिता के मरने के बाद उसकी मां छाता बनाने वाली फैक्ट्री में दस घंटे नौकरी करती। इन परिस्थितियों में पला यह लड़का राजनीति में आया और तीस साल का होने से पहले न्यूयार्क राज्य विधानसभा के लिए चुन लिया गया। परन्तु वह इस जिम्मेदारी के लिए कतई तैयार नहीं था। उसने मुझे बताया कि दरअसल उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि माजरा क्या है। उसने उन लंबे, जटिल विधेयकों का अध्ययन करने की कोशिश की, जिस पर उसे वोट देना था। परन्तु जहां तक उसका सवाल था, उसके पल्ले कुछ नहीं पड़ता था। वह इतना ज्यादा हताश हो गया कि उसने मुझे बताया, “अगर उसे अपनी मां के सामने हार मानने में शर्म नहीं आई होती तो उसने विधानसभा से इस्तीफा दे दिया होता।” उसने फैसला लिया कि वह हर दिन सोलह घंटे पढ़ेगा और अपने अज्ञान के नीबू से ज्ञान के नीबू का शर्बत बनाएगा। ऎसा करके उसने स्वयं को स्थानीय राजनेता से राष्ट्रीय स्तर का नेता बना लिया। वह इतना लोकप्रिय हुआ कि “द न्यूयार्क टाइम्स” ने उसे “न्यूयार्क के सर्वप्रिय नागरिक ” का खिताब दिया।
मैं अलस्मिथ के बारे में बात कर रहा हूं। वे चार बार न्यूयार्क के गवर्नर चुने गए। उस समय यह एक रिकॉर्ड था, जो उनसे पहले कभी किसी व्यक्ति ने नहीं बनाया था। छह शीर्ष विश्वविद्यालयों ने, जिनमें कोलंबिया और हार्वर्ड भी शçामल थे, इस इंसान को मानद उपाधियों से विभूषित किया, जो कभी अपनी प्रारंभिक शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाया था।
अलस्मिथ ने मुझे बताया कि इनमें से कोई चीज क भी नहीं हुई होती अगर उन्होंने हर दिन सोलह घंटे की कड़ी मेहनत नहीं की होती। इसी से वे अपनी नकारात्मक स्थितियों को सकारात्मक अनुभव में बदल सके। “यही जीवन हैक्” नहीं यह जीवन नहीं है। यह जीवन से अधिक है। यह विजयी जीवन है। सुख-शांति का मानसिक रवैया विकसित करने के लिए हमें इस नियम को आत्मसात कर लेना चाहिए।
चौथा फार्मूला
खुद से पूछें, “बुरे से बुरा क्या हो सकता है।”
विलिस एच. कैरियर एक प्रतिभाशाली इंजीनियर थे, जिन्होंने एयर-कंडीशनिंग उद्योग शुरू किया और जो न्यूयार्क में विश्वप्रसिद्ध कैरियर कॉरपोरेशन के प्रमुख थे। चिंता को सुलझाने के लिए इतनी बढि़या तकनीक मैंने बहुत कम सुनी है। कैरियर ने मुझे जो बताया, वह इस प्रकार है-
“मैं न्यूयार्क से बफैलो फोर्ज कंपनी मे काम करता था। मुझे मिसूरी में लाखों डॉलर के कारखाने में गैस साफ करने की मशीन लगाने का काम सौंपा गया। गैस साफ करने का यह तरीका नया था इसलिए मेरे काम में अप्रत्याशित कठिनाईयां आई। मशीन काम करने लगी थी, पर उस तरह नहीं जिस तरह की हमने गारंटी दी थी। साथ में हमें 20 हजार डॉलर का घाटा भी हो रहा था। मैं अपनी इस असफलता से स्तब्ध था। कुछ समय तक तो मैं इतना चिंतित रहा कि मेरी नींद उड़ गई। आखिरकार मुझे एक सीधी सी बात समझ में आ गई कि चिंता करने से मुझे कोई फायदा नहीं होने वाला। मैंने बिना चिंता किए समस्या का हल ढूंढने का रास्ता निकाला। मैंने तीन कदम उठाए।”
पहला कदम- मैंने बिना डरे, ईमानदारी से स्थिति का विश्लेषण किया और अनुमान लगाया कि इस असफलता के परिणामस्वरूप मेरे साथ बुरे से बुरा क्या हो सकता है।
दूसरा कदम- बुरे से बुरे परिणामों का अनुमान लगाने के बाद आवश्यकता पड़ने पर इसे स्वीकार करने के लिए मैंने खुद को तैयार किया।
“बुरी से बुरी स्थिति का अनुमान लगाने और जरूरत पड़ने पर इसे स्वीकार करने के बाद एक महžवपूर्ण बात हुई। मैं तत्काल शांत हो गया और काफी दिनों बाद मैंने पहली बार राहत की सांस ली।”
तीसरा कदम- इसके बाद मैंने अपना पूरा समय और ऊर्जा शांति के साथ इस काम में लगाई कि उन बुरे से बुरे परिणामों को कैसे सुधारा जाए जिन्हें मानसिक रूप से मैंने पहले ही स्वीकार कर लिया था।
मैंने अब ऎसे तरीके खोजने शुरू किए, जिनसे मैं अपनी असफलता को सफलता में बदल सकता था और 20 हजार डॉलर के घाटे को कम कर सकता था। इसके लिए मैंने कई परीक्षण किए और अंत में इस नतीजे पर पहुंचा कि अगर हम एक अतिरिक्त यंत्र खरीदने में पांच हजार डॉलर और खर्च करें, तो हमारी समस्या सुलझ सकती है। हमने ऎसा ही किया। नतीजा, हमारी कंपनी को 20 हजार डॉलर का घाटा होने के बजाए 15 हजार डॉलर का फायदा हो गया।
कैरियर ने आगे कहा, “अगर मैं चिंता करता रहता तो शायद यह कभी नहीं कर पाता, क्योंकि चिंता के साथ बहुत बुरी बात यह है कि यह हमारी एकाग्रता की शक्ति को खत्म कर देती है। हम निर्णय ले पाने की शक्ति खो देते हैं। परन्तु जब हम बुरे से बुरे परिणाम का सामना करने के लिए खुद को विवश करते हैं और उसे मानसिक रूप से स्वीकार कर लेते हैं, तो हम इस स्थिति में आ जाते हैं कि अपनी समस्या पर पूरी एकाग्रता से विचार कर उसे हल कर सकें।”
चिंताजनक स्थितियों को सुलझाने के जादुई टिप्स
- व्यस्त रहें। चिंतित आदमी को पूरी तरह से काम में डूब जाना चाहिए, वरना वह निराशा में मुरझा जाएगा।
- दुखी होने का कारण यह है कि आपके पास यह चिंता करने की फुरसत हो कि आप सुखी हैं या नहीं।
- अपने आपको ऎसी छेाटी-छोटी बातों से विचलित होने की अनुमति नहीं दें, जिन्हें हमें नजरअंदाज कर देना चाहिए।
- खुशी के विचार सोचें, खुशी का अभिनय करें और धीरे-धीरे आप खुशी का अनुभव करने लगेंगे।
- अपनी नियामतें गिनें, कष्ट नहीं।
- अपने दुश्मन के लिए नफरत की भट्टी को इतनी तेज नहीं करें कि आप खुद भी उसमें जल जाएं।
- हर दिन एक अच्छा काम करें, जिससे किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाए।





How to get six pack abbs

31 07 2009

सिक्स पैक एब्सSixPack-main_Full

बॉलीवुड ने “सिक्स पैक एब्स” के रूप में युवाओं को ऎसा शगल दिया है जिसे हर कोई पाना चाहता है। यदि आप भी ऎसा चाहते हैं लेकिन अपनी “एब्स” देख पाने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं तो चिंता मत कीजिए। 6 आसान आदतों को अपनाकर आपको “फिट लुकिंग फिजिक” पाने में बेहद मददगार हो सकती हैं बशर्ते आप इन्हें समन्वित एवं नियमित रूप से अपने जीवन में उतारें।

सुबह उठने के बाद पानी पिएं
कल्पना करें यदि काम करते समय हम पूरे दिन में ना तो चाय/ कॉफी पिएं, ना ही पानी, ऎसा करने पर 8 घंटे की शिफ्ट के बाद हमारी हालत खराब होना स्वाभाविक है। इसी तरह पूरी रात सोने के बाद सुबह उठें और बॉडी को रिहाइड्रेट ना करें तो स्थिति विकट हो जाती है। यही वजह है कि सुबह उठते ही तीन-चार ग्लास ठंडा पानी पीना बेहतर स्वास्थ्य के लिए अत्यावश्यक है।

नाश्ता नियमित रूप से करें
मेसाच्यूसेट्स विश्वविद्यालय का एक अध्ययन बताता है कि सुबह नाश्ता नहीं करने वाले व्यक्तियों में पेट के उभार की समस्या उन व्यक्तियों से साढ़े चार गुना ज्याद होती है जो नियमित रूप से नाश्ता करते हैं। इसलिए प्रात: उठने के बाद एक घंटे के भीतर कुछ खाना अथवा प्रोटीन शेक लेना जिससे कम से कम 250 कैलोरीज मिल सके, अपेक्षित होता है। ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने पाया है कि “ब्रेकफास्ट साइज”, “वेस्ट साइज” के विलोमानुपाती होता है। इसका मतलब है भरपूर नाशता करना आपकी कमर के माप को कम करता है। लेकिन घ्यान रखें, नाश्ते की भरपूरता के निर्धारण में तार्किकता का ध्यान अवश्य ही रखा जाए। इस संदर्भ में डायटीशियन की मदद भी ली जा सकती है।

टार्गेट सामने रखें
आयोवा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक शोध में पाया है कि जो व्यक्ति अपने खान-पान और व्यायाम पर नजर रखते हुए अपने लक्ष्य को सामने रखते हैं, वे लक्ष्य को प्राप्त भी जल्दी करते हैं। इस तरह उद्देश्य सामने ना रखना आपके सारे प्रयासों को निष्फल कर सकता है।

निर्धारित मात्रा में ही लंच करें
आप स्वयं लंच की मात्रा तय ना कर पाएं तो डायटीशियन आपकी मदद कर सकते हैं। लंच की निर्धारित मात्रा से आपको फायदा यह होगा कि आपके शरीर को पर्याप्त कैलोरीज भी मिलेगी और आप ज्यादा खाने से भी बच जाएंगे।

देर तक न जागें
“सिक्स पैक” के लिए पर्याप्त सोना भी आवश्यक है। देर तक जागने से फैट बर्न करने की आपकी क्षमता को प्रभावित करने वाले हॉर्मोüस पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। शिकागो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने हाल ही एक अध्ययन में पाया है कि केवल 3 रात भी पर्याप्त ना सोया जाए तो मांसपेशियों की कोशिकाएं इंसुलिन हॉर्मोन के लिए प्रतिरोधी हो जाती हैं। परिणामत: आपके पेट के चारों ओर वसा का जमना शुरू हो जाता है।
सही तरीके से अभ्यास करें
वांछित लक्ष्य पाने के लिए वेट लिफ्टिंग, रनिंग, एरोबिक एक्सरसाइज जैसी कई विधियां हैं जिनमें से आप टे्रनर की सहायता से अपने लिए अनुकूल विधि को चयनित कर सकते हैं। समुचित रूप से किए गए अभ्यास आपके लक्ष्य को आपके काफी करीब ला सकते हैं।





Great Pandavani Singer – Teejan Bai

23 07 2009

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मैं तो गांव की औरत हूँ तीजन बाई को सब जानते हैं। लोग कहते-लिखते हैं तीजन बाई बहुत बड़ी इंटरनेशनल फेम लोक कलाकार है। पंडवानी पर अपनी विशेष अदायगी के लिए वे पदमश्री से भी नवाजी जा चुकी हैं, पर तीजन बाई को अपनी उपलब्धियों का जरा सा भी गुरूर नहीं है। अपने बारे में, अपनी कला के बारे में और अपने देस के बारे में वे क्या सोचती हैं, जानिए उन्हीं की जुबानी…

ईमानदारी से कहूं मैं आज भी गांव की औरत हूं। सब काम करती हूं। सब्जी बनाती हूं। चटनी बनाती हूं। धान मिंजाई व ओसाई भी कर लेती हूं। आप अपने मन ही बतावो मैं कहां से बड़ी हूं। मेरे दिल में कुछ नहीं है …ऊंच-नीच, गरीब-अमीर कुछ नहीं, मैं सभी से एक जैसे ही मिलती हूं। बात करती हूं। बच्चों बूढ़ों के बीच बैठ जाती हूं। इससे दुनियादारी की कुछ बातें सीखने तो मिलती है और अनुभव भी बाढ़थे। ऎसे में कोई कुछ-कह बोल भी दे तब भी बुरा नहीं लगता। खराब छपने का भी बुरा नहीं मानती। भोपाल के एक पत्रकार ने छापा था कि तीजनबाई डिस्को डांस के समान पंडवानी करती है, ओव्हर मेकअप करती है, ओव्हर पहनती है, वैसा लोक कलाकार को नहीं करना चाहिए। ऎसा बुरा छपने का भी बुरा नहीं लगा… पर सोचना चाहिए, आदिवासी औरतें आज भी कुछ नहीं पहनती, लुगरा पहनती हैं बिना बेलाउज के रहती है। बीड़ी फूंकती हैं, सुट्टा लगाती हैं… मैं भी पहले गांव में ऎसे ही रहती थी। लेकिन आज युग बदल गया है आज मैं जो पहन रही हूँ वह कैसे ओव्हर हो गया सलवार सूट भी तो मैंने नहीं पहनी, न पहलूंगी, साड़ी-पोलखा पहनती हूं। मेकअप का ये सामान देखो, इसमें क्या, पाउडर- क्रीम और बोरोलीन ही तो है क्या ये फुल मेकअप है! मैं पूछती हूं क्या काजर लगाना, टिकली-माहूर सजाना, मांग में सिंदूर भरना, बारों महीना हाथ पर चूडी़ पहरना कैसे ओव्हर है भाइ! मैं आज भी एक टेम बोरे बासी (रात में पका चावल पानी में डालकर) और टमामर की चटनी खाती हूं।

मेरे घर में एक टेम सभी बासी खाते हैं। लोग पूछते-बोलते हैं, तीजनबाई कुछ नाश्ता किया करो तो मैं बोलती हूँ आप अपने मन का नाश्ता करते हो तो मैं बासी क्यों नहीं खा सकती क् भई, बोरे-बासी छत्तीसगढ़ का अमृत है… जौउन ला खाके हम अन जितना काम कर सकते हैं उतना दूसरा भोजन या नाश्ता करके नहीं किया जा सकता। बासी के सामने शराब का नशा भी कुछ नहीं है।

बिदेस खूब घूम डाली हूं, पर अपना देस अलग है वहाँ एक टाइप की कला है यहां विविध कलाएं हैं। मैं धार्मिक सिनेमा को छोड़कर दूसरा कोई सिनेमा भी नहीं देखती, किसी हीरो-हीरोइन को भी नहीं जानती। बचपन में जब दो रोटी भी घर में नहीं थी फिल्म कहां से देखती। पदमश्री मिलने का दिन आज भी मोर सुरता में है, वेंकटरमनजी ने दिया था। उसी दिन इंदिरा गांधी से भी मिली थी बहुत अच्छी लगी, उन्होंने मेरी पंडवानी सुनी थी। मुझे बुलाकर बोली- छत्तीसगढ़ की हो ना। मैने हाँ कहा तो इंदिरा बोली महाभारत करती हो तो मैं बोली पंडवानी सुनाती हूं महाभारत नहीं कराती, सुनकर इंदिराजी खुश हुई और मेरी पीठ थपथपाई थीं।

युग बदल गया तो मैं भी बदल गई लेकिन इतनी नहीं बदली कि लोग अंगुली उठाएं। मैं जो पहनती हूं वही पूरा छत्तीसगढ़ है, अऊ मोर छत्तीसगढ़ के ये श्रृंगार है। यह बुरा कैसे हो सकता है। रही बात डिस्को की, मैं कभी डिस्को नहीं देखती। किसी स्कूल के प्रोग्राम में चीफ गेस्ट बना देते हैं तो देखती हूं छोटे-छोटे लइका लइकी को डिस्को करते, बच्चों का डिस्को करना अच्छा लगता है पर हमारी लोककला में जो बात है वह बिदेशी नाच-गाना में नही। बिदेशी नाच में कमर जरूर हिलबे , अऊ हमार लोककला में दिल हिलबेे। लोककला के बारे में कछू कहना-लिखना आसान है। लेकिन, एला बचाने में बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। अब मेरी अपनी ही बात बताऊं पंडवानी में करांति आ गई है फिर भी मेरे अपने घर में मेरी लोककला का कोई का बस में नहीं है। अच्छी-खासी फौज है बहू-बेटा, नाती पोतों की, पर कोई भी पंडवानी से जुड़ा नहीं है। इसका मुझे कोई दुख भी नहीं है। बाहर कोई कलाकार तो होगा उसे तैयार करूंगी और अपनी कला देकर जाऊंगी, जिसमें प्रतिभा होगी। मेरे बच्चे आज वो सब कर रहे हैं जो मैं नहीं कर पाई यानी मैं एक किलास (क्लास) भी नहीं पढ़ पाई। पढ़ाई न करने का कोई दुख भी नहीं है। हो सकता है पढ़-लिख लेती तो शायद लोककला से नहीं जुड़ पाती।





आहार एवं सुगंध

20 07 2009

angier_smellकिसी भी ग्रह की प्रतिकूलता व्यक्ति को अशांत बना देती है। ग्रह संबंधी आहार या सुगंध का प्रयोग
करके आप प्रतिकूल ग्रह को अनुकूल बना सकते हैं। शास्त्रों में ग्रहों की प्रकृति के अनुसार उनके आहार और सुगंधों का उल्लेख मिलता है। इनमें नौ ग्रहों के अलग-अलग आहार और सुगंध हैं। जिनका प्रयोग करके हम ग्रहजनित दोषों के प्रभाव में कमी ला सकते हैं।
ग्रह संबंधी आहार और सुगंध
-सूर्य की अनुकूलता के लिए आप अपने आहार में केसर, गेहूं, आम, चिकने पदार्थ तथा शहद का उपयोग कर लें। केसर तथा गुलाब के इत्र के उपयोग से भी सूर्य की अनुकूलता प्राप्त होती है।
-चंद्रमा की अनुकूलता के लिए गन्ना, सफेद गुड़, शक्कर, दूध या दूध से बने पदार्थ या सफेद रंग की मिठाई का सेवन करें। चमेली तथा रातरानी का परफ्यूम या इत्र चंद्र संबंधी पीड़ा को शांत करता है।
-मंगल की पीड़ा को कम करने के लिए आप अपने आहार में मूंग, मसूर की दाल, प्याज, गुड़, अचार, जौ या सरसों का उपयोग करें। लाल चंदन के इत्र या तेल के प्रयोग से भी मंगल प्रसन्न होते हैं।
-बुध को इलायची सर्वाधिक प्रिय है। मटर, ज्वार, मोठ, कुलथी, हरी दालें, मूंग, हरी सब्जियां बुध के दोष को कम करती हैं। चंपा के इत्र या तेल के प्रयोग से बुध प्रसन्न होते हैं।
-बृहस्पति की कृपा के लिए चने की दाल, बेसन, मक्का, केला, हल्दी, सेंधा नमक, पीली दालों का प्रयोग कर लें। पीले फूल, केसर या केवड़े का दूध प्रयोग करने से बृहस्पति की कृपा प्राप्त होगी।
-शुक्र की कृपा प्राप्ति के लिए त्रिफला, दालचीनी, कमल गट्टे, मिश्री, मूली या सफेद शलजम का उपयोग आहार में करते रहें। सफेद फूल, चंदन या कपूर की सुगंध शुभ फलदायी है। चंदन के तेल में कपूर डालकर उपयोग करना भी श्रेष्ठ रहता है।
-शनि की कृपा प्राप्त करने के लिए तिल, उड़द की दाल, काली मिर्ची, अलसी एवं मूंगफली का तेल, अचार, लौंग, तेजपत्ता तथा काले नमक का उपयोग आहार में करें। कस्तूरी, लोबान तथा सौंफ की सुगंध शनि को अति पसंद है।
-राहु एवं केतु की पीड़ा से बचने के लिए उड़द, तिल तथा सरसों का प्रयोग लाभदायक होता है। काली गाय का घी, कस्तूरी की सुगंध इन्हें प्रिय है।
-रविवार को उड़द, सोमवार को खीर या दूध, मंगलवार को चूरमा या हलुवा, बुध को हरी सब्जी, गुरूवार को पीले चने की दाल या बेसन का प्रयोग, शुक्रवार को मीठा दही, शनि को चने का सेवन करने से सभी ग्रहों की शांति होती है।








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