लिखिए स्वस्थ रहिए

24 08 2009

लिखते समय आप खुद का ही सामना करते हैं। यह खुद को समझने का स्वर्णिम अवसर होता है।
गम भूलाने के लिए कविता को सबसे अघिक प्रभावी थैरेपी माना गया है। अमरीका की मनोचिकित्सक जैक लिडी वह पहली महिला थी, जिसने रोगियों की चिकित्सा के लिए 1950 में कविता या कविता के अंश का उपयोग किया। अपनी पुस्तक “पोएटिक थैरेपी” में उन्होंने इसकी विस्तृत चर्चा की है। उन्होंने एसोसिएशन ऑफ पोएटिक थैरेपी का गठन भी किया था। एक गीतकार ने लिखा भी है, “है सबसे मघुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं।”

“अपना गम लेकर कहीं और न जाया जाए, कागज-कलम लेकर कुछ लिखा ही जाए।” जी हां, जब भी आपका मन उदास हो, भीतर तूफान उठा हो, क्लेश से जीवन अशांत हो, कलम उठाओ और लिखना शुरू कर दो। कुछ भी लिखें, कविता, कहानी, आत्मकथा, डायरी… सचमुच आप राहत महसूस करेंगे। यकीन न हो, तो स्वयं करके देख लीजिए। विशेषज्ञ भी यही कह रहे हैं राइटिंग एक थैरेपी है सम्पूर्ण पद्धति, जो आपकी मन:स्थिति को बदल देती है। दरअसल तन-मन को तरोताजा कर देने वाली राइटिंग थैरेपी वर्तमान में सर्वाघिक हॉटेस्ट चिकित्सा पद्धति है, क्योंकि यह नई है और कारगर भी।

अंतर्मुखी स्वभाव के लोग अक्सर अपनी परेशानियों को लेकर अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं, वे अपनी पीड़ा किसी को नहीं बताते। यदि उन्हें लिखने के लिए कह दिया जाए, तो गमों से उनका घ्यान बंटेगा। वे अपनी पीड़ा को व्यक्त कर पाएंगे। उनके दर्द कम होंगे और इस तरह लेखनी उनकी हमदर्द बन जाएगी। महान साहित्यकार प्रेमचंद ने तो कहा ही यही है कि लिखते तो वे लोग हैं, जिनके अंदर कुछ दर्द है, अनुराग है, लगन है, विचार है।

लेखन की शक्ति को मनोचिकित्सक भी मानते हैं। दिल्ली के मनोचिकित्सक डॉ. अवघेश शर्मा अपने रोगियों को लिखने की सलाह देते हैं। “डिस्ट्रेस टू डिस्ट्रेस” पुस्तक में वे लिखते हैं कि लेखन हमारे विचारों की दशा और तनावजनक स्थितियों से उपजी समस्याओं को समझने में सहायता करता है। समस्या के समझ में आते ही समाघान भी तुरंत मिल जाते हैं। अपोलो अस्पताल के सलाहकार चिकित्सक डॉ. अचल भगत भी अपने रोगियों से लिखने का आग्रह करते हैं। उनके अनुसार चिकित्सा की इस कॉग्रिटिव प्रणाली में रोगियों की मानसिकता को बदलने एवं उनकी समस्या के समाघान की क्षमता होती है।

दस साल की बिन मां-बाप की बच्ची संजू अपनी छोटी-छोटी बातें डायरी में लिखकर अकेलापन दूर करने की कोशिश करती है। सविता ने अपने तेरह साल के बच्चे के निघन के बाद लिखना शुरू किया, इस लेखन ने उसके इतने बड़े गम को भूलाने में मदद की। उसे शब्दों की शक्ति का अनुमान हुआ। मुम्बई निवासी निम्मी कुमार का लिखना तो उदाहरण ही बन गया है। बच्ची की बीमारी से दुखी निम्मी ने 1986 में शिरड़ी सांईबाबा का नाम सवा लाख बार लिखने का संकल्प लिया। 50 हजार से ऊपर नाम लिखने के बाद उसने नाम को सीघा-सीघा न लिखकर कुछ इस तरह कलात्मक ढंग से लिखा कि गणेश की आकृति बन गई। इसी से प्रेरित होकर उसने यही नाम बड़े कैनवास पर लिखना शुरू कर दिया। गणेश के बाद उसने शिव, दुर्गा आदि के चित्र बनाए। आलम यह है कि आज उसकी पेंटिंग्स की संख्या 300 से ऊपर हंै। उसकी एकल प्रदर्शनी दिल्ली, मुंबई सहित विदेशों में भी आयोजित हो चुकी है।
इस मुकाम पर पहुंचने के बाद निम्मी कहती हैं कि इस लेखन ने मेरे लिए थैरेपी का ही काम किया है। इसने मुझे कठिन परिस्थितियों मे जीने का संबल दिया, कार्यो में एकाग्रता प्रदान की और असीम शक्ति दी।

पंजाबी की विख्यात लेखिका अमृता प्रीतम भी लेखन को थैरेपी मानती थीं। उनका कहना था कि लिखते समय आप खुद का ही सामना करते हैं। यह खुद को समझने का स्वर्णिम अवसर होता है। पर इससे भी महžवपूर्ण है कि “क्या आप कभी साक्ष्य बने हैं-योग अथवा आघ्यात्मिकता के उच्चतम आदर्श का-आप अनुभव या लेखन करते हैं और साक्ष्य भी बनते हैं। अन्य लेखक भी लेखन को थैरेपी मानते हैं या नहीं यह उनके जागरूकता के उच्चतम स्तर पर पहुंचने की उत्कंठा पर निर्भर करता है। यदि वे मात्र ख्याति प्राप्त करने के लिए लिख रहे हैं तो वह व्यर्थ है।”

पुलिस पदाअघिकारी किरण बेदी का भी यही मानना है कि लेखन थैरेपी है। आपने जो लिखा है, आप उसे देख सकते हैं, पढ़ सकते हैं और उसकी समीक्षा भी कर सकते हैं। वास्तव में आप दो व्यक्तियों मे बंट जाते हैं, लेखक और पाठक। किरण बेदी ने तिहाड़ जेल के कैदियों को भी अपनी भावनाओं को लिखने की सलाह दी थी, जिसका संकलन बाद में हिंदी, अंगे्रजी और उर्दू में प्रकाशित करवाया गया। लेखन घ्यान की तरह है। यह मस्तिष्क को स्थिरता प्रदान करता है, तनाव कम करता है, जीवन खुशियों से भर देता है। यही नहीं सोच और मनोवृत्ति को भी बदल देता है ।आप अंतर्मुखी से बहिर्मुखी होने लगते हैं, नकारात्मक सोच की बजाय सकारात्मक सोच विकसित करता है। लिख कर आप स्वस्थ और तरोताजा महसूस करते हैं।

इस तरह लेखन चिकित्सा का एक रूप हो सकता है। अगर आपका मन यह स्वीकार नहीं करता, तो भी क्या बुराई है लेखन में। इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं है, न ही आपको कोई शुल्क चुकाना है। तो फिर न झिझकें, उठाएं कागज-कलम और लिखें अपने विचारों और भावनाओं को। क्या लिखना है, नहीं लिखना है, कैसे लिखना है, लिखना है या नहीं यह अब आपके हाथ में है।


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